रिव्यू से पहले 3 डीआरएस तथ्य पढ़ें
क्रिकेट में डीआरएस यानी निर्णय समीक्षा प्रणाली अंपायर के फैसले को तकनीक से दोबारा जांचने का तरीका है। 2026 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इसका संचालन आईसीसी नियमों के तहत होता है, जबकि हॉक-आई, अल्ट्राए...
रिव्यू से पहले 3 डीआरएस तथ्य पढ़ें
क्रिकेट में डीआरएस यानी निर्णय समीक्षा प्रणाली अंपायर के फैसले को तकनीक से दोबारा जांचने का तरीका है। 2026 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इसका संचालन आईसीसी नियमों के तहत होता है, जबकि हॉक-आई, अल्ट्राएज और हॉट स्पॉट इसके प्रमुख साधन हैं। खिलाड़ी को आमतौर पर 15 सेकंड के भीतर समीक्षा मांगनी होती है। टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट में प्रत्येक टीम को पारी में सामान्यतः 2 असफल समीक्षाएं, जबकि टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच में 1 असफल समीक्षा मिलती है। सफल समीक्षा या अंपायर कॉल पर समीक्षा बची रहती है। तीसरा अंपायर पहले नो-बॉल, फिर बल्ले का संपर्क और उसके बाद गेंद की दिशा जांचता है। क्रिकेट चर्चा के पाठकों के लिए सीधी सलाह यही है: समीक्षा मांगने से पहले गेंद की ऊंचाई, बल्ले का किनारा और स्टंप की रेखा—इन तीनों को अलग-अलग समझें।

डीआरएस ने क्रिकेट के पुराने धूलभरे फैसलों में एक नया कैमरा लगा दिया है—लेकिन कैमरा भी जादूगर नहीं होता। इसका उद्देश्य हर निर्णय बदलना नहीं, बल्कि स्पष्ट गलती पकड़ना है। इसलिए “स्क्रीन पर तकनीक दिखी, मतलब फैसला पलटेगा” वाली धारणा उतनी ही कमजोर है जितनी आखिरी ओवर में बिना गणना के जोखिम लेना। क्रिकेट चर्चा पर क्रिकेट के अंपायरिंग नियमों की शुरुआती मार्गदर्शिका पढ़कर आप मैदानी फैसले और तकनीकी समीक्षा का अंतर भी समझ सकते हैं।
क्या आगे बढ़ने से पहले पूरी समीक्षा प्रक्रिया देखना चाहते हैं?
शीर्ष 3 डीआरएस हिस्से एक नजर में
डीआरएस को केवल तीसरे अंपायर की स्क्रीन समझना भूल है; यह नियम, समय-सीमा, उपलब्ध तकनीक और मैदानी निर्णय का संयुक्त ढांचा है। नीचे तीन सबसे महत्वपूर्ण हिस्से क्रम से दिए गए हैं।
- अंपायर कॉल और समीक्षा नियम: यह तय करते हैं कि करीबी एल्बीडब्ल्यू फैसले में मूल निर्णय कब बरकरार रहेगा।
- गेंद-ट्रैकिंग: हॉक-आई गेंद के पिच, प्रभाव और स्टंप तक संभावित रास्ते का अनुमान लगाती है।
- अल्ट्राएज और हॉट स्पॉट: ये बल्ले, पैड या दस्ताने से हुए संपर्क की जांच में सहायता करते हैं।
यह क्रम जानबूझकर रखा गया है। तकनीक से पहले नियम आता है, क्योंकि उपलब्ध फुटेज का अर्थ वही होगा जो आईसीसी की खेल शर्तें अनुमति देती हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की खेल शर्तों में समीक्षा की संख्या और प्रक्रिया प्रारूप के अनुसार बदल सकती है; इसलिए किसी पुराने टेस्ट मैच का नियम सीधे टी20 पर चिपकाना समझदारी नहीं, चाहे सोशल मीडिया ने उसे कितनी गंभीरता से साझा किया हो।
#1 अंपायर कॉल: सबसे महत्वपूर्ण डीआरएस नियम
अंपायर कॉल डीआरएस का वह परिणाम है जिसमें गेंद-ट्रैकिंग मैदानी अंपायर के निर्णय को निर्णायक रूप से गलत साबित नहीं करती। एल्बीडब्ल्यू में गेंद का पिच होना, पैड पर प्रभाव और स्टंप से टकराने का अनुमान देखा जाता है। यदि परिणाम सीमा-रेखा के भीतर रहता है, तो मूल निर्णय कायम रहता है और समीक्षा सामान्यतः वापस मिल जाती है।
यह व्यवस्था क्यों है? क्योंकि हॉक-आई वास्तविक गेंद का भविष्य नहीं देखती; वह कैमरा-आधारित आंकड़ों से प्रक्षेपण बनाती है। गेंद की गति, सीम की स्थिति, पिच का उछाल और कैमरा कोण जैसे तत्व मॉडल में शामिल होते हैं, पर हर अनुमान में अनिश्चितता रहती है। इसी कारण “स्टंप का आधा हिस्सा लग रहा था” जैसी स्थिति को पूर्ण निश्चितता नहीं माना जाता। मैदानी अंपायर का निर्णय तब हटता है जब उपलब्ध प्रमाण स्पष्ट और निर्णायक हो।
एल्बीडब्ल्यू समीक्षा में पहले यह पूछा जाता है कि गेंद विकेट के बीच पिच हुई या नहीं। फिर प्रभाव का स्थान देखा जाता है और अंत में अनुमान लगाया जाता है कि गेंद स्टंप पर लगती या नहीं। बल्लेबाज के आगे बढ़ने, गेंद के कोण और पैड की ऊंचाई का प्रभाव हर मामले में अलग होता है। यही वह बिंदु है जहां दर्शक अक्सर एक ही फ्रेम देखकर निष्कर्ष निकालते हैं—और फिर आंकड़े उन्हें विनम्रता का छोटा पाठ पढ़ाते हैं।
- पिचिंग: गेंद कहां टप्पा खाई।
- इम्पैक्ट: गेंद पैड से किस हिस्से में टकराई।
- विकेट: गेंद स्टंप को कितनी मात्रा में प्रभावित करती।
- अंपायर कॉल: सीमा-रेखा वाला परिणाम, जिसमें मूल निर्णय कायम रहता है।
आईसीसी के नियमों में समीक्षा प्रणाली का व्यावहारिक सिद्धांत यही है कि तकनीक स्पष्ट गलती सुधारती है, हर करीबी अनुमान को पलटती नहीं। नियम-पुस्तिका का सार “निर्णायक प्रमाण के बिना मूल निर्णय न बदलना” है। यह वाक्य रोमांचक नहीं है, पर निष्पक्षता अक्सर रोमांचक नहीं होती—और शायद यही उसकी उपयोगिता है।
अंपायर कॉल को लेकर दो कम चर्चित तथ्य
पहला, समीक्षा असफल घोषित नहीं मानी जाती जब परिणाम अंपायर कॉल हो; टीम को वह समीक्षा सामान्यतः वापस मिलती है। दूसरा, गेंद-ट्रैकिंग पर दिखने वाला लाल, पीला या हरा दृश्य अपने आप निर्णय नहीं है; तीसरा अंपायर को प्रसारण फुटेज, मैदानी निर्णय और नियमों को साथ पढ़ना पड़ता है। यानी रंगीन ग्राफिक्स फैसला नहीं सुनाते, वे केवल प्रमाण का एक हिस्सा दिखाते हैं।

क्या एल्बीडब्ल्यू के तीन चरणों को उदाहरणों के साथ समझना उपयोगी लगेगा?
#2 गेंद-ट्रैकिंग: एल्बीडब्ल्यू के लिए सबसे उपयोगी तकनीक
गेंद-ट्रैकिंग, जिसे सामान्यतः हॉक-आई से जोड़ा जाता है, कैमरों से गेंद की स्थिति रिकॉर्ड करके उसके संभावित रास्ते का मॉडल बनाती है। यह तकनीक पिचिंग, इम्पैक्ट और विकेट—एल्बीडब्ल्यू के तीनों प्रश्नों में सहायता देती है। इसका उपयोग नो-बॉल जांच, गेंद की ऊंचाई और कभी-कभी कैच समीक्षा के संदर्भ में भी समीक्षा दल के व्यापक दृश्य को बेहतर बनाता है।
प्रक्रिया को तीन चरणों में समझें। पहले कई उच्च-गति कैमरे गेंद को अलग-अलग कोणों से रिकॉर्ड करते हैं। फिर सॉफ्टवेयर उन फ्रेमों से गेंद की गति और दिशा का अनुमान लगाता है। अंत में मॉडल यह प्रक्षेपित करता है कि पैड से टकराने के बाद गेंद स्टंप तक किस रास्ते से पहुंचती। इसीलिए गेंद के पैड से लगने के बाद की वास्तविक उड़ान नहीं दिखाई जाती; स्क्रीन पर दिखाई देने वाला हिस्सा अनुमानित विस्तार होता है।
यहां एक महत्वपूर्ण सीमा है: गेंद-ट्रैकिंग का परिणाम “संभावित रास्ता” है, प्रत्यक्ष दृश्य नहीं। खासकर जब गेंद लेग स्टंप के किनारे से गुजरती हो या प्रभाव विकेट के सामने सीमारेखा के निकट हो, तब अंपायर कॉल लागू हो सकती है। दर्शक अक्सर 99 प्रतिशत जैसी भाषा खोजते हैं, लेकिन हर प्रसारण में मॉडल की सटीकता का एक ही सार्वजनिक प्रतिशत घोषित नहीं किया जाता। इसलिए किसी वेबसाइट या वीडियो की मनगढ़ंत सटीकता को आधिकारिक आंकड़ा समझना जोखिमपूर्ण है।
विकिपीडिया का निर्णय समीक्षा प्रणाली विवरण डीआरएस के विकास, हॉक-आई और अन्य तकनीकी साधनों का सामान्य संदर्भ देता है। हालांकि प्रतियोगिता की वास्तविक शर्तें आईसीसी, संबंधित बोर्ड और मैच के प्रारूप से तय होती हैं। 2026 में भी यही व्यावहारिक बात लागू है: प्रसारण में दिखने वाली सुविधा और उस मैच की आधिकारिक खेल शर्तें एक ही चीज नहीं हैं।
- गेंद पिच होने के स्थान को पहले देखें।
- पैड से संपर्क के समय गेंद की ऊंचाई और कोण पर ध्यान दें।
- स्टंप पर प्रभाव को अंपायर कॉल की सीमा के साथ समझें।
- प्रसारण ग्राफिक्स को अंतिम कानूनी निर्णय न मानें।
#3 अल्ट्राएज और हॉट स्पॉट: संपर्क का सबसे अच्छा प्रमाण
अल्ट्राएज, जिसे स्निकोमीटर भी कहा जाता है, गेंद के बल्ले या पैड के पास से गुजरने के समय ध्वनि और कंपन में आए बदलाव को रिकॉर्ड करता है। हॉट स्पॉट अवरक्त तकनीक से गेंद और बल्ले या पैड के संपर्क के बाद बने तापीय निशान को दिखाने का प्रयास करता है। दोनों का लक्ष्य यह पता लगाना है कि गेंद ने बल्ले, दस्ताने, पैड या जमीन से संपर्क किया था या नहीं।
कैच और किनारे वाले मामलों में तीसरा अंपायर आमतौर पर पहले मैदानी निर्णय और उपलब्ध वीडियो को देखता है। फिर अल्ट्राएज की ध्वनि-रेखा, सामान्य गति, धीमी गति और कैमरा कोण मिलाए जाते हैं। यदि गेंद बल्ले के पास से गुजरते समय ध्वनि आती है, तो यह संपर्क का संकेत हो सकता है; मगर बल्ले का जमीन से टकराना, पैड की आवाज या आसपास का शोर भी समान संकेत पैदा कर सकता है। यही कारण है कि ध्वनि की एक छोटी उछाल को अकेले निर्णायक नहीं माना जाता।
हॉट स्पॉट की उपयोगिता परिस्थितियों पर निर्भर करती है। गेंद की गति, बल्ले का कोण, सतह की चमक और कैमरा कवरेज परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। कई अंतरराष्ट्रीय मैचों में अल्ट्राएज का उपयोग अधिक नियमित दिखाई देता है, जबकि हॉट स्पॉट की उपलब्धता प्रसारण और आयोजन व्यवस्था पर निर्भर कर सकती है। यानी “डीआरएस में हमेशा हॉट स्पॉट होता है” कहना गलत है। तकनीक की सूची प्रतियोगिता की सुविधा-सूची नहीं होती—काश हर बहस में यह साधारण बात याद रहती।
क्रिकेट में कैच और किनारे की समीक्षा समझने की मार्गदर्शिका
समीक्षा कैसे मांगी जाती है और समय कितना मिलता है?
समीक्षा मांगने के लिए बल्लेबाज या फील्डिंग कप्तान दोनों हाथों से अंग्रेजी अक्षर टी जैसा संकेत करता है और मैदानी अंपायर को बताता है कि निर्णय चुनौती दी जा रही है। सामान्यतः यह संकेत फैसले के लगभग 15 सेकंड के भीतर देना होता है। संकेत के बाद अंपायर पुष्टि करता है कि समीक्षा वैध समय में मांगी गई है, फिर तीसरे अंपायर को मामला भेजा जाता है।
यह प्रक्रिया केवल हाथ का संकेत नहीं है; इसमें रणनीतिक अनुशासन भी शामिल है। बल्लेबाज आउट दिया गया हो तो वह कप्तान या साथी खिलाड़ी से जल्दी सलाह ले सकता है, लेकिन अंतिम संकेत निर्धारित व्यक्ति को करना होता है। फील्डिंग टीम में कप्तान आम तौर पर निर्णय लेता है, जबकि गेंदबाज और विकेटकीपर सलाह दे सकते हैं। समीक्षा का समय समाप्त होने के बाद किया गया संकेत स्वीकार नहीं किया जाता, भले ही टीवी दर्शक को अगले फ्रेम में स्पष्ट उत्तर क्यों न दिखाई दे।
तीसरा अंपायर आम तौर पर समीक्षा को क्रम में जांचता है। कैच या एल्बीडब्ल्यू में पहले नो-बॉल की जांच हो सकती है, क्योंकि नो-बॉल होने पर विकेट का परिणाम बदल जाता है। इसके बाद बल्ले का संपर्क, कैच की वैधता, गेंद के पैड से लगने का स्थान और फिर एल्बीडब्ल्यू की गेंद-ट्रैकिंग देखी जाती है। इस क्रम का उद्देश्य तकनीकी शोर को घटाना है, न कि प्रसारण में अतिरिक्त नाटकीय विराम पैदा करना—हालांकि दर्शक उस विराम में आधी जिंदगी जी लेते हैं।
क्या समीक्षा मांगने की समय-सीमा याद रखना चाहते हैं?
समीक्षा कितनी मिलती हैं और कब बचती हैं?
टीम को मिलने वाली समीक्षा की संख्या मैच के प्रारूप और प्रतियोगिता की खेल शर्तों पर निर्भर करती है। आईसीसी के सामान्य अंतरराष्ट्रीय ढांचे में टेस्ट और एकदिवसीय मैचों में प्रत्येक टीम को पारी में 2 असफल समीक्षा, जबकि टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 1 असफल समीक्षा की सीमा देखने को मिलती है। सफल समीक्षा में निर्णय बदलने पर समीक्षा बचती है; अंपायर कॉल का परिणाम आने पर भी समीक्षा सामान्यतः बरकरार रहती है।
यहां “असफल” शब्द का अर्थ समझना जरूरी है। यदि तीसरा अंपायर मैदानी निर्णय को कायम रखता है और मामला अंपायर कॉल नहीं है, तो समीक्षा खर्च हो सकती है। यदि तकनीकी जांच से गेंद बल्ले से लगी साबित हो जाती है, या एल्बीडब्ल्यू में मूल नॉट-आउट फैसला आउट में बदल जाता है, तो समीक्षा सफल मानी जाती है। एक ही समीक्षा में कई प्रश्न जांचे जा सकते हैं; टीम को हर तकनीकी चरण के लिए अलग समीक्षा नहीं मिलती।
नियमों में बदलाव भी संभव हैं। घरेलू प्रतियोगिताएं, महिला क्रिकेट, जूनियर क्रिकेट और विशेष टूर्नामेंट अलग समीक्षा सीमा लागू कर सकते हैं। इसलिए मैच शुरू होने से पहले प्रसारण में दिखाई गई खेल शर्तों या आधिकारिक प्रतियोगिता दस्तावेज को देखना बेहतर है। आईसीसी के आधिकारिक नियम और खेल शर्तें सबसे विश्वसनीय प्रारंभिक स्रोत हैं, जबकि सोशल मीडिया पर घूमती पुरानी तालिका अक्सर 2020 के नियमों को 2026 की सच्चाई बनाकर पेश करती है।
रिव्यू बचाने की व्यावहारिक रणनीति
कप्तान को केवल अपील की तीव्रता देखकर समीक्षा नहीं लेनी चाहिए। गेंदबाज का कोण, बल्लेबाज की स्थिति, विकेटकीपर की आवाज और अल्ट्राएज की संभावित उपयोगिता—इन चार संकेतों को मिलाकर निर्णय लेना अधिक तर्कसंगत है।
- एल्बीडब्ल्यू में: गेंद का पिचिंग और इम्पैक्ट पहले समझें।
- कैच में: विकेटकीपर के दस्ताने, गेंद की ऊंचाई और जमीन से दूरी देखें।
- किनारे में: बल्ले और पैड के पास गेंद की आवाज पर ध्यान दें।
- समय में: 15 सेकंड की सीमा से पहले स्पष्ट निर्णय लें।
- समीक्षा बचाने में: अंपायर कॉल को असफल समीक्षा न समझें।

डीआरएस की सीमाएं और आम गलतफहमियां क्या हैं?
डीआरएस गलत फैसलों को कम करता है, लेकिन निर्णय की पूर्ण गारंटी नहीं देता। कैमरा कवरेज अधूरा हो सकता है, ध्वनि में हस्तक्षेप हो सकता है, गेंद-ट्रैकिंग अनुमान पर आधारित होती है और अंपायर कॉल सीमा-रेखा वाले मामलों में मूल निर्णय बचाती है। इसलिए डीआरएस का सही अर्थ “अधिक प्रमाण के साथ निर्णय” है, “हर निर्णय का स्वचालित सुधार” नहीं।
सबसे आम गलतफहमी यह है कि तीसरा अंपायर मैदानी अंपायर से ऊपर बैठा अंतिम न्यायाधीश है। वास्तव में तीसरा अंपायर समीक्षा प्रोटोकॉल और उपलब्ध प्रमाण के भीतर काम करता है। दूसरी गलतफहमी यह है कि हर गेंद पर समीक्षा ली जा सकती है; सीमित समीक्षा, समय-सीमा और वैध अपील की शर्तें लागू रहती हैं। तीसरी समस्या प्रसारण ग्राफिक्स को कानून समझना है। स्क्रीन पर बनी रेखा दर्शक के लिए दृश्य सहायता है, पर आधिकारिक फैसला नियमों और समीक्षा अधिकारी की व्याख्या से आता है।
एक उपयोगी, कम चर्चित बात यह है कि तकनीकी उपलब्धता सभी मैदानों पर समान नहीं होती। कैमरों की संख्या, प्रकाश, प्रसारण व्यवस्था और प्रतियोगिता का बजट समीक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। इसीलिए किसी एक श्रृंखला में दिखी समीक्षा सुविधा को हर घरेलू मैच का स्थायी मानक मानना गलत निष्कर्ष है। क्रिकेट चर्चा पर क्रिकेट तकनीक और प्रसारण प्रणालियों का विश्लेषण इस अंतर को और स्पष्ट करता है।
डीआरएस के फैसले को दर्शक कैसे पढ़ें?
दर्शक डीआरएस को समझने के लिए पहले मैदानी निर्णय याद रखे, फिर समीक्षा के प्रश्नों को क्रम से पढ़े। यदि फैसला आउट था, तो पूछें कि क्या तकनीक ने उसे स्पष्ट रूप से गलत सिद्ध किया; यदि नॉट-आउट था, तो देखें कि गेंद-ट्रैकिंग या संपर्क प्रमाण इतना निर्णायक है या नहीं कि मूल निर्णय हटे। यह तरीका भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय नियम-आधारित समझ देता है।
प्रसारण में इन संकेतों पर ध्यान दें:
- मैदानी निर्णय: प्रारंभिक आउट या नॉट-आउट फैसला।
- संपर्क जांच: गेंद बल्ले या पैड से लगी थी या नहीं।
- नो-बॉल जांच: फील्डिंग या गेंदबाज की वैधता।
- गेंद-ट्रैकिंग: पिचिंग, इम्पैक्ट और विकेट।
- अंतिम परिणाम: निर्णय बरकरार, बदला या अंपायर कॉल।
यहां एक contrarian निष्कर्ष निकलता है: डीआरएस का सबसे बड़ा लाभ हमेशा निर्णय बदलना नहीं, बल्कि विवाद की सीमा घटाना है। यदि किसी मैच में दस समीक्षाओं में केवल दो फैसले बदले, तो शेष आठ को बेकार कहना गलत होगा; उन समीक्षाओं ने निर्णय की विश्वसनीयता जांची। तकनीक ने क्रिकेट को त्रुटिहीन नहीं बनाया, उसने त्रुटि को मापने योग्य बनाया। आंकड़ों से डरने वाले दर्शक इसे नीरस कह सकते हैं, पर निष्पक्षता का यही कम चमकदार चेहरा है।
कुल मिलाकर, डीआरएस समझने के लिए तीन सूत्र याद रखें: नियम पहले, तकनीक दूसरे और भावनात्मक प्रतिक्रिया सबसे अंत में। अंपायर कॉल को समीक्षा की विफलता न मानें, 15 सेकंड की समय-सीमा न भूलें और प्रारूप के अनुसार समीक्षा संख्या जांचें। यही तरीका लाइव मैच, स्कोरकार्ड और समीक्षा ग्राफिक्स—तीनों को सही संदर्भ देता है।
क्या मैच देखते समय इन नियमों को तुरंत पहचानना चाहते हैं?

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: क्रिकेट में डीआरएस क्या है?
उत्तर: डीआरएस अंपायर के मैदानी निर्णय की तकनीक-आधारित समीक्षा प्रणाली है। इसमें कप्तान या बल्लेबाज निर्धारित समय के भीतर समीक्षा मांगते हैं और तीसरा अंपायर वीडियो, अल्ट्राएज, हॉट स्पॉट तथा गेंद-ट्रैकिंग की सहायता से फैसला जांचता है। इसका उद्देश्य स्पष्ट गलतियों को सुधारना है, हर करीबी निर्णय को बदलना नहीं।
प्रश्न: डीआरएस लेने के लिए कितने सेकंड मिलते हैं?
उत्तर: समीक्षा मांगने के लिए सामान्यतः लगभग 15 सेकंड मिलते हैं। यह समय मैदानी अंपायर के फैसले के बाद शुरू होता है और कप्तान या बल्लेबाज को दोनों हाथों से टी का संकेत देकर समीक्षा मांगनी होती है। प्रतियोगिता की आधिकारिक खेल शर्तों में अलग व्यवस्था हो सकती है, इसलिए मैच-पूर्व नियम देखना सुरक्षित रहता है।
प्रश्न: टेस्ट, वनडे और टी20 में कितने डीआरएस मिलते हैं?
उत्तर: सामान्य आईसीसी ढांचे में टेस्ट और वनडे में प्रत्येक टीम को पारी में 2 असफल समीक्षाएं, जबकि टी20 अंतरराष्ट्रीय में 1 असफल समीक्षा मिलती है। सफल समीक्षा या अंपायर कॉल पर समीक्षा सामान्यतः बची रहती है। घरेलू टूर्नामेंट और विशेष प्रतियोगिताएं अलग संख्या लागू कर सकती हैं, इसलिए आधिकारिक नियम निर्णायक स्रोत हैं।
प्रश्न: अंपायर कॉल और असफल डीआरएस में क्या अंतर है?
उत्तर: अंपायर कॉल में गेंद-ट्रैकिंग परिणाम सीमा-रेखा वाला होता है और मैदानी अंपायर का फैसला कायम रहता है। ऐसी स्थिति में समीक्षा सामान्यतः टीम के खाते में बची रहती है, जबकि स्पष्ट रूप से असफल समीक्षा खर्च हो जाती है। यह अंतर खासकर एल्बीडब्ल्यू में पिचिंग, इम्पैक्ट और विकेट के अनुमान से तय होता है।
प्रश्न: डीआरएस में अल्ट्राएज और हॉट स्पॉट कैसे काम करते हैं?
उत्तर: अल्ट्राएज ध्वनि और कंपन के बदलाव से गेंद के बल्ले या पैड से संपर्क का संकेत देता है, जबकि हॉट स्पॉट अवरक्त तकनीक से संपर्क-स्थान के तापीय निशान दिखाने का प्रयास करता है। तीसरा अंपायर इन संकेतों को सामान्य गति, धीमी गति और अलग-अलग कैमरा कोणों के साथ पढ़ता है। किसी एक आवाज या चमकीले निशान को अकेले अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता।
प्रश्न: अगर डीआरएस काम न करे या तकनीकी समस्या आ जाए तो क्या होता है?
उत्तर: तकनीकी खराबी की स्थिति में तीसरा अंपायर उपलब्ध फुटेज और मैदानी अंपायर के निर्णय के आधार पर प्रक्रिया पूरी कर सकता है। कैमरा, ध्वनि या गेंद-ट्रैकिंग उपलब्ध न होने पर समीक्षा का दायरा सीमित हो सकता है और प्रतियोगिता की खेल शर्तें लागू होती हैं। ऐसे मामलों में प्रसारण संकेतों के बजाय अंपायर की आधिकारिक घोषणा को अंतिम माना जाता है।
प्रश्न: क्या डीआरएस हर अंपायर की गलती सुधार सकता है?
उत्तर: नहीं, डीआरएस केवल उपलब्ध तकनीकी प्रमाण और समीक्षा नियमों की सीमा में स्पष्ट गलतियों को सुधार सकता है। खराब कैमरा कोण, अस्पष्ट ध्वनि, अनुमानित गेंद-ट्रैकिंग और अंपायर कॉल के कारण कुछ फैसले मूल रूप में रह सकते हैं। इसलिए डीआरएस को पूर्ण न्याय की मशीन नहीं, बल्कि निर्णय की गुणवत्ता बढ़ाने वाला नियंत्रित उपकरण समझना चाहिए।
क्रिकेट चर्चा पर डीआरएस, मैच समीक्षा, खिलाड़ी आंकड़े, आईपीएल कवरेज और बल्लेबाजी-बॉलिंग रणनीति से जुड़े नए विश्लेषण पढ़ते रहें। नियम समझ में आ जाएं तो मैच का रोमांच कम नहीं होता—बस बहस में गलत आत्मविश्वास थोड़ा कम हो जाता है, और यह भी कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।
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